अकेली मुस्लिम महिला बनीं 6 करोड़ बेजुबानों की जुबान, अब मोदी सरकार भी खड़ी इनके साथ!

1947 में भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र के तौर पर पुन: स्थापित हुआ था. 1950 में भारत एक लोकतांत्रिक,पंथनिरपेक्ष राष्ट्र बना जिसने अपने सभी नागरिकों को 7 मौलिक अधिकार (हलांकि अब 6 मौलिक अधिकार कर दिए गये क्योंकि सम्पति के अधिकार को कानून के रूप में मान्यता प्रदान की गयी है न की मौलिक अधिकार के रूप में ) प्रदान किये थे जिससे भारतीय नागरिकों को स्वत: ही समानता और स्वतंत्रता के अधिकार प्राप्त हो गये थे.

एक धार्मिक समुदाय विशेष के ठेकेदारों को यह नागवार गुज़रा कि औरतों कैसे पुरुषों की बराबरी कर सकती है. अत: धर्म की आड़ लेकर इस संवैधानिक अधर्म को क्रियान्वयित किया गया. शरीयत कानून ने मुस्लिम महिलाओं से उनके मौलिक अधिकार छीन लिए. धार्मिक स्वतंत्रता की आज़ादी की आड़ में महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता का कत्ल कर दिया गया. नेहरु से लेकर इंदिरा गांधी तक “मुस्लिम महिलाओं की सिसकियाँ नहीं पहुँच पायी. शरीयत ने मुस्लिम महिलाओं से अदालत जाने का अधिकार भी छीन लिया.
इस जहाँ में तन्हाई ही तन्हाई है मेरी ख़ातिर
ए ख़ुदा तू क्यों नहीं होता कभी मुझसे मुखातिब

1987 में शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं को समानता का अधिकार देते हुए राजीव गांधी सरकार से “हिन्दू कोड बिल”की तरह “यूनिफ़ार्म सिविल कोड बिल” बनाने का आदेश दिया.

लेकिन मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे, मुल्ला और मौलवियों के आगे झुककर राजीव गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को जनादेश (इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद सिम्पैथी लहर के चलते कांग्रेस की 404 सीटें थी ) के दम पर मुस्लिम महिलाओं के माथे गुलामी लिख दी.

उत्तराखंड की रहने वाली, शाह बानो को उसके पति ने एक साथ तीन तलाक़ दे डाले. असहाय शाह बानो कमज़ोर नहीं पड़ी और उसने न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. शायरा बानो पहली मुस्लिम महिला है जिसने ट्रिपल तलाक़ को चुनौती देने के क्रम में “मौलिक अधिकारों के अनुच्छेद 15,21 और 25 का हवाला देते हुए समानता का अधिकार, लिंग और धर्म के नाम पर भेदभाव से सरंक्षण और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के आधार पर “ट्रिपल तलाक़” को खत्म करने की अपील की.

शाह बानो  सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि अनुच्छेद 25 के अनुसार ऐसा कोई भी धार्मिक रीति-रिवाज जो स्वास्थ, नैतिकता और सामाजिक शान्ति के विरुद्ध हो उसे तत्काल प्रभाव से समाप्त कर देना चाहिए.

शाह बानो के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार को अपना पक्ष अदालत के सामने रखने का आदेश दिया. मोदी सरकार,स्वतंत्र भारत की पहली सरकार है जिसने पूरी दृढ़ता के साथ मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों की रक्षा की बात की. मोदी सरकार ने स्पष्ट शब्दों में कहा “ऐसा कोई भी धार्मिक कानून जो किसी भी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन करता है, संवैधानिक तौर पर वो गैर क़ानूनी है. मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने ‘यूनिफार्म सिविल कोड बिल’की अपनी मंशा की भी अनुशंसा कर दी.

बरसों पहले, शाह बानो के साथ इंसाफ़ नहीं हो पाया था, तब मुल्ला-मौलवियों के आगे बेबस सरकार ने कानून बनाकर, सुप्रीम कोर्ट को लाचार बना दिया था. लेकिन अब मोदी सरकार और सुप्रीम कोर्ट को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इस बार शायरा बानो के साथ नाइंसाफ़ी नहीं होनी चाहिए.

By: Gaurav Katiyar on Friday, December 16th, 2016

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