जब शहीद अरुण खेत्रपाल के ब्रिगेडियर पिता अपने बेटे को मारने वाले पाकिस्तानी फौजी से मिले

साल 2001 में जब भारत और  पाकिस्तान के लोगो का एक दुसरे के देश में आना जाना हो रहा था. उस समय ब्रिगेडियर ML खेत्रपाल को पाकिस्तान का कोई बिग्रेडियर बार बार संदेश भेजकर उन्हें पाकिस्तान बुला रहा था. ऐसा उनके साथ कई सालों से होता आ रहा था लेकिन वे बार बार इसको नजरअंदाज करते जा रहे थे. एक दिन उन्होंने सोचा क्यों न उस पाकिस्तानी फौजी से इस बार वे मिल आएं. इसके साथ ही उनकी एक आखिरी ख्वाहिश ये भी थी, कि उनकी मौत से पहले वे अपने पुश्तैनी घर जोकि पाकिस्तान सरगोधा में है उसे देख आए.

इसके बाद हिन्दुस्तानी फौजी का स्वागत पाकिस्तान के लाहौर में रहने  वाले ख्वाजा मोहम्मद नसीर ने ठीक वैसे किया जैसे उनका कोई अपना सालों बाद घर वापिस आया हो. पुरे 3 दिनों तक नसीर और उनके नौकर हिन्दुस्तानी रिटायर्ड फौजी की देखभाल करते रहे और उनके काफी करीब आ गए थे. हिन्दुस्तानी फौजी की समझ में ये बिलकुल नही आ रहा था कि आखिर क्यों दुश्मन देश का ये फौजी उनकी इतनी खातिरदारी कर रहा है.

जब हिन्दुस्तानी फौजी का वापिस जाने का समय हुआ तो पाकिस्तानी फौजी ने उनसे एक बात कही – सर एक बात है जो कई सालों से मैं आपको बताना चाहता था, मगर बताने का तरीका नही जानता था. मुझे आपकी खिदमत करने का मौका मिला, मैं इसके लिए शुक्रगुजार हूँ. मगर इसकी वजह से मेरा रास्ता और मुश्किल हुआ है. मेरे ही हाथो आपके बेटे अरुण का कत्ल हुआ था.

ये वही अरुण है जिन्हें बहुत कम उम्र में परमवीरचक्र से सम्मानित किया गया था. 1971 की भारत और पाकिस्तान की वो लड़ाई जिसमें भारतीय सेना के पास सिर्फ 3 बटालियन थी जबकि पाकिस्तान के पास 5 बटालियन थी. इसके अलावा भी बहुत सारे ऐसे कारण थे जिसकी वजह से पाकिस्तान भारत पर भारी पड़ा था. उस युद्ध में सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण को 3 टैंको के साथ पाकिस्तान की इतनी बड़ी सेना को रोकने की जिम्मेदारी दी गयी थी.

अरुण आखिरी दम तक लड़ते रहे और उन्होंने पाकिस्तान के 10 टैंको को नष्ट कर दिया था. ये देखकर पाकिस्तानी सेना भी आगे बढने से डरने लगी थी. जिस समय अरुण ने पाकिस्तानी सेना का आखिरी टैंक नष्ट किया तो वह उनसे 100 मीटर की दुरी पर था. अरुण को वहां से भागने के कई आदेश दिए गए लेकिन उनके टैंक में आग लग गयी थी और उनके आखिरी शब्द रेडियो पर ये थे.

सर मेरी गन अभी फायर कर रही है. जबतक ये काम करती रहेगी मैं फायर करता रहूँगा. 

इसके बाद टैंक में पूरी तरह से आग लग गयी और वे देश के लिए शहीद हो गए. आगे नसीर ने अरुण के पिता को बताया कि अरुण और उनमे से केवल एक ही जिन्दा बच सकता है और शायद उनकी किस्मत अच्छी थी कि वे बच गए. इसके साथ ही नसीर ने ये भी बताया कि फौजियों को ट्रेनिंग मिलती है कि दुश्मन से लड़ते समय भावनाओं और तर्क के बारे में न सोचें. मगर अरुण खेत्रपाल की बहादुरी की और उसके साथ हुए इस एनकाउंटर के बाद अक्सर नसीर के अंदर का इंसान उनके एक फौजी होने पर भारी पड़ता था.

अरुण के पिता नसीर की पूरी बात को बड़ी ही ख़ामोशी से से सुन रहे थे. इसके बाद उन्होंने नसीर से सिर्फ इतना ही कहा कि – तुम अपनी डयूटी कर रहे थे और वो अपनी कर रहा था. अरुण की बहादुरी के कारण ही उनकी कहानी का जिक्र पाकिस्तानी वेबसाइट पर भी किया गया है.

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By: Mukesh Saksham on Monday, December 17th, 2018